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ऐसा था अटल ब‍िहारी के शब्‍दों का जादू- न‍ियमों को ताक पे रख


धूल और धुएं की बस्ती में पले एक साधारण अध्यापक के पुत्र श्री अटल बिहारी वाजपेयी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के दसवें प्रधानमंत्री बने। वह तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे और अपनी प्रतिभा, नेतृत्व क्षमता और लोकप्रियता के चलते वे चार दशकों से भी अधिक समय तक सांसद रहे।

अटल जी के भाषणों में कुछ ऐसा जादू था कि लोग उन्हें सुनते ही रहना चाहते थे। उनके बारे में एक क‍िस्‍सा मशहूर है। एक बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उन्हें भेजा गया। दूर का सफर था और ट्रेन लेट हो गई। जब हॉल में पहुंचे तो प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी थीI निर्णायक मंडल अपना निर्णय तैयार करने में व्यस्त थे। सभी लोग निर्णय की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे थेI तभी अटल जी मंच पर चढ़ गए और अध्यक्ष महोदय से क्षमा याचना करते हुए अपना भाषण आरंभ कर दिया। और उनका भाषण इतना मनमोहक था क‍ि न‍िर्णायक मंडल ने न केवल नियमों को ताक में रखा और वाद व‍िवाद का समय समाप्‍त होने के बावजूद भी उनके भाषण को प्रतियोगिता का हिस्‍सा माना बल्‍कि उन्हें गुणवत्‍ता के कारण प्रथम पुरस्कार भी प्रदान किया। ऐसा था अटल जी के शब्‍दों का जादू।


वे अपने जीवन काल में शरीर का कण-कण राष्ट्र सेवा के यज्ञ में अर्पित करते रहेI वह कहते थे - हम जिएंगे तो देश के लिए, मरेंगे तो देश के लिए।

अटल जी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर की शिंदे की छावनी में हुआ था। अटल, जो कभी टल ना सके, जो दृढ़ हो व बिहारी- जो सदैव प्रसनता से विचरण करता हो। अटल जी के पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी बटेश्वर के विद्वान व्यक्ति थे। बटेश्वर उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में यमुना के तट पर स्थित है। और यह गांव महादेव के मंदिर की वजह से सबसे प्रसिद्ध हैI लोग श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी को आदर्श मानते थे और उनका हमेशा सम्मान करते थे। अटल के पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे और वह उन्हें प्यार से अटला कहा करते थे। अटलजी की मां का नाम सोमा देवी था। शादी के बाद उनका नाम कृष्णा पड़ गया। वह बहुत ही कोमल स्वभाव की महिला थी। परिवार के लोगों के साथ साथ आस-पड़ोस के लोगों का ध्यान रखती, वह सब के सुख दुख में साथ रहती थी। वाजपेयी जी के पिता जी का मानना था कि हमें अपने धार्मिक ग्रंथों को अध्ययन मनन करना चाहिए क्योंकि यह हमें संस्कारवान बनाते हैं वह जीवन के उच्च नैतिक मूल्य सिखाते हैं।

अटल जी का मानना है कि हमारे अंदर अनुशासन भी होना चाहिए और अनुशासन से ज्यादा जरूरी है- स्वशासन। अनुशासन से बंधन का एहसास होता है लेकिन स्वशासन हमें अच्छा इंसान बनाने की प्रेरणा देता हैI


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1 comentario


Hardeep Kaur
Hardeep Kaur
15 dic 2022

Very Informative

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